➤ दृष्टिबाधित संघ ने सचिवालय से मुख्यमंत्री आवास तक पैदल मार्च निकाला
➤ 902 दिनों से शिमला में धरने पर बैठे, बैकलॉग पद भरने की मांग
➤ मांगे न माने जाने पर नग्न प्रदर्शन और आत्मदाह की चेतावनी
शिमला में दृष्टिबाधित जन संगठन का आंदोलन अब और तेज हो गया है। पिछले 902 दिनों से अपनी मांगों को लेकर धरने पर बैठे संगठन के सदस्यों ने सोमवार को सचिवालय से मुख्यमंत्री के सरकारी आवास तक पैदल मार्च निकाला। यह आंदोलन हिमाचल प्रदेश के इतिहास में सबसे लंबे आंदोलनों में से एक माना जा रहा है। संगठन के सदस्य लंबे समय से विभिन्न विभागों में दृष्टिबाधित कोटे के खाली बैकलॉग पदों को एकमुश्त भरने की मांग कर रहे हैं।
सोमवार को संगठन के सदस्य अपनी मांगों को लेकर सचिवालय से मुख्यमंत्री आवास की ओर पैदल रवाना हुए, लेकिन पुलिस ने उन्हें बीच रास्ते में ही रोक लिया। इसके बाद प्रदर्शनकारियों ने सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगों पर जल्द फैसला नहीं लिया गया तो वे नग्न होकर प्रदर्शन करेंगे। उन्होंने यहां तक कहा कि जरूरत पड़ी तो आत्मदाह जैसे कदम से भी पीछे नहीं हटेंगे, जिसकी पूरी जिम्मेदारी सरकार और प्रशासन की होगी।
दृष्टिबाधित जन संगठन के सचिव राजेश ठाकुर ने कहा कि विभिन्न सरकारी विभागों में दृष्टिबाधित कोटे के 1,100 से अधिक पद लंबे समय से खाली पड़े हैं। उनका आरोप है कि सरकार के साथ कई दौर की बातचीत हो चुकी है, लेकिन अब तक कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया है। उन्होंने कहा कि जब भी संगठन चक्का जाम या बड़ा प्रदर्शन करता है, तब सरकार वार्ता के लिए बुलाती है, लेकिन बाद में कोई कार्रवाई नहीं होती।
राजेश ठाकुर ने कहा कि संगठन पिछले लंबे समय से अपने हकों और रोजगार के लिए संघर्ष कर रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि हालिया बजट में भी दृष्टिबाधितों के लिए कोई विशेष प्रावधान नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि 1995 के बाद से दृष्टिबाधित कोटे के कई पद नहीं भरे गए, जबकि इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट भी भर्तियों के आदेश दे चुका है। इसके बावजूद सरकार की ओर से कार्रवाई न होना बेहद चिंताजनक है।
संगठन का कहना है कि राज्य में दृष्टिबाधितों के लिए विशेष आईटीआई और स्कूलों की सुविधाएं मौजूद हैं, लेकिन रोजगार के अवसर नहीं मिलने से पढ़े-लिखे युवा बेरोजगार बैठे हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार हिमाचल प्रदेश में दृष्टिबाधित व्यक्तियों की संख्या 16,613 थी, जिनमें 8,815 पुरुष और 7,798 महिलाएं शामिल थीं। ऐसे में रोजगार और आरक्षित पदों की भर्ती का मुद्दा और गंभीर हो जाता है।
शिमला में जारी यह आंदोलन अब सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। संगठन ने साफ कहा है कि यदि जल्द उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं, तो आंदोलन को और उग्र किया जाएगा।



